प्रेगनेंसी के दौरान डॉक्टर कई तरह की जांच और सोनोग्राफी करवाने की सलाह देते हैं। नॉर्मल सोनोग्राफी के बाद जब डॉक्टर अचानक कलर सोनोग्राफी (Color Sonography / Color Doppler) करवाने के लिए कहते हैं, तो होने वाली मां के मन में कई सवाल और डर आने लगते हैं— क्या इससे बेबी के रंग का पता चलता है? क्या यह नॉर्मल सोनोग्राफी से अलग है? या इससे कोई नुकसान तो नहीं होगा?
आइए, प्रसिद्ध गायनेकोलॉजिस्ट और ऑब्सटेट्रिशियन डॉ. गौरी जगदाळे (कंसलटेंट, वेदांत क्लीनिक, केशव नगर) से जानते हैं कि कलर सोनोग्राफी क्या होती है और प्रेगनेंसी में इसकी क्या अहमियत है।
बहुत से लोगों को लगता है कि कलर सोनोग्राफी से बच्चे के रंग-रूप या गोरे-काले होने का पता चलता है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है!
कलर सोनोग्राफी का असली नाम कलर डॉप्लर अल्ट्रासाउंड (Color Doppler Ultrasound) है। यह एक ऐसी एडवांस सोनोग्राफी तकनीक है, जिसकी मदद से डॉक्टर बेबी और प्लेसेंटा (आल) के ब्लड सर्कुलेशन (रक्त प्रवाह) की जांच करते हैं। इसमें स्क्रीन पर लाल (Red) और नीले (Blue) रंगों के जरिए यह दिखाया जाता है कि बच्चे और प्लेसेंटा तक खून सही तरीके से पहुंच रहा है या नहीं।
इस सोनोग्राफी की मदद से डॉक्टर मुख्य रूप से निम्नलिखित चीज़ों की जांच करते हैं:
गर्भाशय की धमनियां (Uterine Artery): मां से बच्चे तक खून पहुंचाने वाली नसों का फ्लो।
नाल का ब्लड फ्लो (Umbilical Cord): अंबिलिकल कॉर्ड के जरिए बच्चे को मिलने वाले पोषण की स्थिति।
ब्रेन वेसल्स (MCA): बच्चे के मस्तिष्क की मुख्य रक्त धमनियों (Middle Cerebral Artery) की जांच।
इन सभी वेसल्स के ब्लड फ्लो से डॉक्टर को यह साफ पता चलता है कि आपके बच्चे को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन और खून मिल रहा है या नहीं।
यह सवाल अक्सर पूछा जाता है कि क्या यह जांच सबको करवानी पड़ती है?
सबको जरूरत नहीं: यह टेस्ट हर प्रेग्नेंट महिला के लिए अनिवार्य नहीं होता। डॉक्टर आमतौर पर इसे तीसरी तिमाही (Third Trimester) में करवाने की सलाह देते हैं।
विशेष परिस्थितियों में जरूरी: यदि आपको हाई ब्लड प्रेशर (BP), बेबी की ग्रोथ से जुड़ी कोई समस्या, बच्चे की हलचल कम होना, प्लेसेंटा से जुड़ा कोई इशू, या ट्विन प्रेगनेंसी (जुड़वां बच्चे) जैसी कोई मेडिकल कॉम्प्लिकेशन है, तो डॉक्टर आपको यह जांच थोड़ा पहले या बार-बार करवाने के लिए कह सकते हैं।
कई महिलाएं पांचवें महीने होने वाले स्कैन और कलर डॉप्लर को एक ही समझ लेती हैं, जबकि दोनों में बड़ा फर्क है:
एनॉमली स्कैन (5वें महीने का स्कैन): यह बच्चे का एक डिटेल स्ट्रक्चरल एनालिसिस होता है, जिसमें सिर से पैर तक बच्चे के अंगों (Head to Toe Structure) की बनावट की जांच की जाती है।
कलर डॉप्लर: इसमें मुख्य रूप से बेबी और प्लेसेंटा के ब्लड फ्लो (रक्त संचार) को परखा जाता है।
हाँ, यह पूरी तरह सुरक्षित है! अगर आपके डॉक्टर ने मेडिकल जरूरत के हिसाब से किसी ट्रेंड सोनोलॉजिस्ट से कलर डॉप्लर करवाने को कहा है, तो इससे आपके बच्चे को कोई नुकसान नहीं पहुंचता।
हालांकि, सिर्फ अपनी जिज्ञासा (Curiosity) शांत करने के लिए बार-बार अल्ट्रासाउंड करवाना सुरक्षित नहीं माना जाता। इसलिए डॉक्टर की सलाह और जरूरत के अनुसार ही यह जांच करवाएं।
डॉ. गौरी जगदाळे की सलाह है कि यदि आपके डॉक्टर ने आपको कलर सोनोग्राफी करवाने की सलाह दी है, तो गूगल पर पढ़कर घबराएं या पैनिक बिल्कुल न करें। यह जांच डॉक्टर को आपके बच्चे की सेहत, ग्रोथ और ऑक्सीजन सप्लाई की सटीक जानकारी देने में मदद करती है। हमेशा अपने डॉक्टर के निर्देशों का पालन करें और अपनी प्रेगनेंसी के इस सफर को सुरक्षित और तनावमुक्त बनाएं।
स्टे हेल्दी, स्टे ट्यून!
क्या आपके मन में कलर सोनोग्राफी या प्रेगनेंसी केयर से जुड़ा कोई सवाल है? आप नीचे कमेंट करके पूछ सकती हैं!
Dr. Gauri Jagdale is a specialist gynecologist and obstetrician with 8 years of experience, practicing at Vedant Clinic in Keshavnagar, Mundhwa. She is also a consultant at Momstory Sahyadri Hospital, Hadapsar, and Motherhood Hospital, Kharadi. She specializes in infertility treatment, high-risk pregnancy, and cosmetic gynecology. From routine prenatal care to advanced fertility solutions, Dr. Gauri offers personalized medical excellence for women across Pune.
For 7 years, Vedant Clinic has served Mundhwa, Keshavnagar, Magarpatta City, Amanora City, Hadapsar, Kharadi, Wagholi, Ghorpadi, and Manjari.
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